'NATURE' लिखा तो पढ़ा 'नथूरे'... 'EDUCATION' लिखने को कहा तो लिखा 'AGUQUSAN'... और जब पूछा कि देश के उपराष्ट्रपति कौन हैं, तो जवाब मिला- 'नहीं पता!'
यह किसी पहली-दूसरी कक्षा के बच्चे के उत्तर नहीं हैं, बल्कि मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में 15 से 20 सालों से पढ़ा रहे उन शिक्षकों के जवाब हैं, जिन्हें हर महीने सरकार से 50 हजार रुपए से ज्यादा वेतन मिलता है।
एक तरफ प्रदेश के सेवारत शिक्षक सरकार की 'शिक्षक पात्रता परीक्षा' (TET / दक्षता परीक्षा) का यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि वे सालों से बच्चों को पढ़ा रहे हैं, तो अब उनकी योग्यता पर सवाल क्यों उठाए जा रहे हैं?
वहीं दूसरी तरफ जब दैनिक भास्कर की इन्वेस्टिगेशन टीम ने 20 दिनों तक छतरपुर और राजगढ़ जिलों के सरकारी स्कूलों में जाकर गुरुजी की काबिलियत परखी, तो ऐसी ही हकीकत देखने को मिली।
इतना ही नहीं राजगढ़ में शिक्षकों का टेस्ट लेकर लौट रही भास्कर की टीम को शिक्षक और उसके साथियों ने घेर लिया और धमकी दी कि खबर छापी तो हमसे बुरा कोई नहीं होगा। पढ़िए रिपोर्ट
केस स्टडी-1: छतरपुर का बराखेड़ा स्कूल
9वीं-10वीं के सोशल साइंस टीचर को नहीं पता हड़प्पा सभ्यता
छतरपुर के शासकीय हाई स्कूल बराखेड़ा में धनराज अहिरवार बीते 19 सालों से 9वीं और 10वीं के छात्रों को सोशल साइंस पढ़ा रहे हैं। उन्होंने D.Ed भी किया है।
जब भास्कर टीम ने उनसे विषय से जुड़ा सवाल पूछा कि 'हड़प्पा सभ्यता का कार्यकाल क्या है?', तो वे बगलें झांकने लगे और कहा- ‘नहीं पता।’
इसके बाद जब उनसे अंग्रेजी में Nature लिखने को कहा तो उन्होंने बोर्ड पर 'Naicher' और Application की जगह 'APLICATION' लिखा। देश के उपराष्ट्रपति और केंद्रीय शिक्षा मंत्री का नाम भी उन्हें नहीं मालूम था।
केस स्टडी-2: छतरपुर का नदियाबेहर स्कूल
प्राचार्य जी बोले: 'इंग्लिश में थोड़े कमजोर हैं'
शासकीय प्राथमिक शाला नदियाबेहर (छतरपुर) के प्राचार्य बारेलाल आदिवासी से जब पूछा गया कि बाघ को अंग्रेजी में क्या कहते हैं, तो उन्होंने 'टाइगर' बताया। लेकिन जब बोर्ड पर लिखने को कहा तो स्पेलिंग 'Tigar' लिख दी।
जब बोर्ड पर 'NATURE' लिखकर पढ़ने को कहा गया तो उन्होंने उसे 'नथूरे' पढ़ा। जब एप्लीकेशन लिखने को कहा गया तो बोले- ‘हम हड़बड़ा गए हैं, इंग्लिश में थोड़े कमजोर हैं, हिंदी में लिखवा लीजिए।’
इसके बाद जब हिंदी में 'वरिष्ठ' और 'स्टूडेंट' लिखने को कहा गया तो वे उसे भी 'बरिष्ट' और 'स्टूटेंड' ही लिख सके।
केस स्टडी-3: राजगढ़ का चाटूखेड़ा व उदयपुरिया स्कूल
Future को पढ़ा 'फीचर', Education की स्पेलिंग लिखी 'AGUQUSAN'
राजगढ़ जिले के शासकीय प्राथमिक विद्यालय चाटूखेड़ा में 1998 से पढ़ा रहे रमेश वर्मा ने बोर्ड पर लिखे Nature को 'नेटूरे' पढ़ा और एजुकेशन की गलत स्पेलिंग लिखी। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री का नाम गोविंद सिंह राजपूत बताया।
वहीं, शासकीय प्राथमिक विद्यालय उदयपुरिया के शिक्षक हुकुम सिंह कारपेंटर (जो सभी विषय पढ़ाते हैं) ने बोर्ड पर लिखे 'Future' को 'फीचर' पढ़ा। 'Education' की स्पेलिंग 'AGUQUSAN' लिखी, 'Tuition' को 'TUESN' और 'निष्कलंक' को 'निसंकलंक' लिखा।
प्रदेश के शिक्षा मंत्री का नाम उन्होंने 'अभिषेक सिंह' बताया। इसी स्कूल के दूसरे शिक्षक अमृतलाल 1 अक्टूबर से बिना किसी सूचना के गायब मिले।
भास्कर टीम का घेराव: कार रोककर बोले- ‘खबर मत छापना, वरना अच्छा नहीं होगा’
पड़ताल के दौरान जब भास्कर की टीम राजगढ़ के उदयपुरिया स्कूल से रिपोर्टिंग कर लौट रही थी, तब चाटूखेड़ा के शिक्षक बारेलाल अपने 4-5 साथियों के साथ रास्ते में खड़े हो गए। उन्होंने जबरन कार को हाथ देकर रुकवाया और चारों तरफ से घेर लिया।
शिक्षकों ने गुस्से में कार का दरवाजा खोला और चिल्लाते हुए टीम को बाहर आने को कहा। जब रिपोर्टरों ने अपना पहचान पत्र दिखाया और बताया कि वे मीडिया से हैं, तो शिक्षकों ने उग्र होकर कुछ और लोगों को बुलाने के लिए फोन लगा दिया।
काफी समझाने-बुझाने और परिचितों से बात कराने के बाद ही उन्होंने जाने दिया। जाते-जाते धमकी भरे लहजे में कहा- हमारी खबर मत छापना, वरना अच्छा नहीं होगा।
सालाना 38,000 करोड़ का बजट, फिर भी अनपढ़ जैसा हाल
शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE), 2009 के तहत शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए शिक्षकों की सक्षमता परीक्षा अनिवार्य की गई है।
वर्तमान आंकड़ों (UDISE 2024-25) के मुताबिक, मध्य प्रदेश में 76 हजार से अधिक सरकारी स्कूल हैं, जिनमें 3 लाख 90 हजार शिक्षक तैनात हैं। वर्ग-1, वर्ग-2 और वर्ग-3 के शिक्षकों की सैलरी अलग-अलग है।
वर्ग-1 के शिक्षक को करीब 1 लाख रुपए, वर्ग-2 के शिक्षक को करीब 90 हजार और वर्ग-3 के शिक्षक को करीब 65 हजार रुपए सैलरी मिलती है। तीनों वर्ग की औसत सैलरी 85 हजार रुपए महीना होती है।
इस तरह से राज्य सरकार हर साल करीब 3978 करोड़ रुपए सिर्फ शिक्षकों के वेतन पर खर्च करती है। इसके अलावा हर साल 3 प्रतिशत की वेतन वृद्धि भी होती है।
क्यों हो रहा है TET का विरोध?
शिक्षक संगठनों का तर्क है कि जो शिक्षक 1998 या RTE लागू होने से पहले से सेवाएं दे रहे हैं, उन पर अब ढलती उम्र में परीक्षा थोपना गलत है।
उन्हें डर है कि यदि वे इस दक्षता परीक्षा में असफल हो गए, तो वर्षों पुरानी उनकी पक्की नौकरी पर संकट आ सकता है। इसी मांग को लेकर भोपाल से लेकर प्रदेशभर में धरने-प्रदर्शन किए जा रहे हैं।
शिक्षक संगठन से जुड़े जगदीश यादव कहते हैं कि हम नहीं चाहते कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार न हो। शिक्षकों को अपडेट करने की जरूरत है। अगर कुछ शिक्षक निर्धारित स्तर के अनुरूप नहीं हैं, तो उन्हें चिह्नित कर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।